समकालीन हिंदी कविता में छत्तीसगढ़ के युवा कवियों का योगदान

 

गिरिजा साहू1, शैलेन्द्र कुमार ठाकुर2, कृष्णा चटजी3

1शा. विश्वनाथ यादव तामस्कर, स्वशासी स्नातको. महावि. दुर्ग, महाविद्यालय,

भिलाई-3, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ।

2सहायक प्राध्यापक, हिन्दी, डॉ. खू...शास.स्नातका., छत्तीसगढ।

3सहायक प्राध्यापक, हिन्दी, शा. विश्वनाथ यादव तामस्कर, स्वशासी स्नातो. महावि. दुर्ग, छत्तीसगढ।

*Corresponding Author E-mail: vcservices25@gmail.com

 

ABSTRACT:

कविता आम आदमी के जीवन पर प्रकाश डालने वाले एक ऐसी विधा है जो लोक चेतना को चेताने के साथ ही लोक मानस को जगाने का भी काम करती है। वास्तव में कविता कभी हंसाती है तो कभी रूलाती है उसके साथ ही साथ हमें एक अच्छा आदमी बनने की सीख भी देती है। आद्य कवि वाल्मीकि से शुरू होती हुई यह परम्परा कालीदास, भावभूति, कबीर, तुलसी, सूर से होते हुए निराला, जयशंकार प्रसाद, पंत, अज्ञेय, मुक्तिबोध, धूमिल जैसे साहित्य सृजन करने वाले उन तमाम कवियों की वैचारिक भावभूमि से हम पाठकों को आम मानवीकी व्याकरण एवं अनु भवों से अनुभावित करती है। कविता हमेें जीवन दर्शन से परिचित कराती है। वहीं हमें जीवन के बहुमूल्य अर्थ कोे समझाती भी है। कविता मनुष्य को मनुष्य बनने की सीख देते हुए प्रतीकों, बिम्बों चित्रों एवं रेखाचित्रों के माध्यम से आम आदमी की पीड़ा को आम आदमी तक पहुॅंचाती है। इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। हमारे सम्मुख रखते हुए सामाजिक सोच एवं विचार को प्रस्तुत करने का आईना दिखाने का काम करती है।

 

KEYWORDS: वास्तव में कविता की कहानी को देखा जाए तो यह तमाम उतार-चढ़ाव को झेलते हुए आम आदमी के जीवन दर्शन को आम आदमी तक पहुॅंचाती है।

 

 


INTRODUCTION:

हिंदी साहित्य के विकास में छत्तीसगढ़ के समकालीन कवियों का विशेष योगदान देखने को मिलता है।

छत्तीसगढ़ के समकालीन कवियों में मुक्तिबोध की चर्चा आदर पूर्वक होती है। जिन्होंने अंधेरे मेंभूल गलती , ब्रम्हराक्षसजैसी कविताओं के माध्यम से मानव मन की अंतर्निहित दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक भावों को आम आदमी तक पहुॅचाने का काम किया। वे लिखते हैं कि -

जिन्दगी के ........

कमरों में अॅंधेरे

लगाता है चक्कर। कोई एक लगातार

आवाज पैरों की देती है सुनाई

बार-बार . . . . बार-बार,

वह नहीं दीखता . .  नहीं ही दीखता,

किन्तु वह रहा घूम

तिलस्मी खेाह में गिरफ्तार कोई एक,

भीत-पार आती हुई पास से

गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि - सा।1

 

अंधेरे में इनकी रचना कालजयी मानी जाती है। इनकी रचनाएॅं हिंदी साहित्य को समृद्ध करते हुए समकालीन साहित्य को एक नया आयाम देती है। इसके साथ ही विनोद कुमार शुक्ल का नाम बड़े ही आदर एवं सम्मान के साथ लिया जाता है। इनका जन्म राजनांदगांव जिले में हुआ था। विनोद कुमार शुक्ल समकालीन साहित्य में अपने प्रखर, समर्थता, सार्थकता एवं अद्वितीय कल्पनाशीलता और मौलिक प्रयोगों के लिए चिर्चित हुए हैं। इनकी रचनाएॅं छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति एवं छत्तीसगढ़िया मानस को बड़े ही बारीकी के साथ उकेरने का काम की है। इनकी रचनाएॅं साहित्य के माध्यम से समाज को नयी दिशा एवं आयाम देते हुए आम आदमी की कहानी को आम आदमी के समक्ष रखने का काम की है। इन्होंने अपनी कविताओं में मुहावरों एवं लोकोक्तियों को स्थान देते हुए समसामयिक घटनाओं उपघटनाओं को चित्रवत दिखाने का काम किया है।2

 

छत्तीसगढ़ के समकालीन कवियों में बालकवि बैरागी, प्रभात त्रिपाठी, रवि श्रीवास्तव, लाला जगदलपुरी, रउफ परवेज, हरीशवाढ़ेर, अशोक वाजपेयी, अशोक शर्मा, ललित सुरजन, संजय अलंग, अशोक सिंघई, पुष्पा तिवारी, विश्वरंजन, रमेश अनुपम, संजीव बख्शी, लीलाधर मंडलोई, जया जादवानी, एकान्त श्रीवास्तव, कमलेश्वर साहू, विनोद शर्मा, शिव शैलेन्द्र, डॉ. अंजन कुमार, वंदना कंेगरानी, जयप्रकाश मानस, बुद्धिलाल पाल, नासिर अहमद सिकन्दर, मीता दास, बसंत त्रिपाठी, डॉ. शंकरमुनि राय, गड़बड़चन्द्रकुमार जैन, डॉ. रतन जैन, उमाकांत शर्मा, के साथ ही युवा कवयित्री अल्पना त्रिपाठी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से छत्तीसगढ़ के समकालीन काव्य को एक नई उॅंचाई तक ले जाने का काम किया है। हिंदी साहित्य के विकास में युवा कवियों की अहम भूमिका रही है। इन युवा कवियों में जयप्रकाश मानस को एक प्रौढ़ हस्ताक्षर के रूप में जाना जाता है। इन्होंने छत्तीसगढ़ की माटी की पावनता को दिखाते हुए आदिवासी जीवन की झलक दिखलाई है।

 

इनके काव्य में धार्मिक आडम्बरों पर विशेष प्रहार किया है। वे लिखते हैं कि -

तुमने हमारे मंदिर ढ़हाए

हमने तुम्हारे मस्जिद

शायद तुम अंधे हो गए थे

और हम भी

चलो गलतियॉं दोनों से हुई

इंसान थे पर यह तो बुझे आखिर क्यों

तुम्हें रोका पैगम्बर ने

हमें राम ने समझाया 3

 

जय प्रकाश मानस ने छत्तीसगढ़ के गॉंव एवं आदिवासियों पर लिखते हुए कहा है कि -

चाहता हूॅं ताउम्र

आदिवासी गमकता रहे

कोठी में धान की मानिंद

गॉंव में तीज-तिहार की मानिंद

पोखर में हनिहारिनों की हॅंसी की मानिंद

वन में चार चिरोंजी की मानिंद।

छत्तीसगढ़ के समकालीन हिंदी कवि अशोक सिंघई की कविताओं में अलविदा बीसवीं सदीनामक एक चर्चित काव्य संग्रह रहा है। सिंघई की रचनाएॅं हमें अपनी स्थिति परिस्थिति पर पुनर्विचार करने की प्रेरणा देती है। इनकी कविताओं में भाव एवं विचार का मणिकंचन संयोग देखने को मिलता है। आज के समय की भयावहता को प्रकट करते हुए वे लिखते हैं कि -

खून बहाने से खून जलाने तक

राजनीति का तयशुदा है सफर

अब लोग गोलियों से नहीं

भूख सें। कंुठा से माने जाते हैं

आबादी का बढ़ना

मृत्युदर घटना

हमारी चिंता के विषय है।

बढ़ते हुए हिस्से

इसलिए धकिया दिए जा रहे है।

अपनी भूमिका लगभग निभा चुके लोग।5

 

प्रभात त्रिपाठी छत्तीागढ़ के समकालीन कवियों में एक अग्रणी नाम है। उनका काव्य लेखन अन्य समकालीन कवियों के काव्य लेखन से भिन्न है। उनका मानना है कि आज मनुष्य नैराष्य और अकेलेपन में जीवन यापन कर रहा है। एक कविता ही है जो उनकी बेबसी को समझती है अैार परिस्थितियों के संकीर्णता एवं अकेलेपन से बाहर निकलने में उसकी मदद करती है। व्यक्ति की बेचैनी को वह कविता के माध्यम से व्यक्त करता है -

कुछ भी सूझता नहीं करने को

बेनींद रात के तीसरे पहर के अरूण एकान्त में

लगभग भागता ही रहता है दिमाग

झुंझलाते सन्नाटे में देखता अपना अतीत।6

 

प्रभात त्रिपाठी की कविताओं मंे कई संदर्भों और सरोकरों के रंग रूप देखने को मिलते हैं। एक ओर इनकी कविताएॅं दलित, शोषित एवं हताश जन की ओर हमारा ध्यान खींचती है वहीं दूसरी ओर यथार्थ और यथार्थ के आतंक की ओर ईशारा करती है।

 

समकालीन हिंदी कवता के विकास में युवा कवि डॉ. विनोद शर्मा की भी अहम भूमिका है। उनक काव्य संग्रह धरती कभी बांझ नहीं होतीमें इन्होंने स्त्री विमर्श के साथ ही साथ प्राकृतिक सौंदर्य एवं मानवीय मूल्य को प्रतिष्ठापित करने के लिए जिस तरह से अपने काव्य में शब्दों का चयन किया है वह इनके वौद्धिक क्षमता एवं आंतरिक भावों को दर्शाने वाला है। विनोद शर्मा के संदर्भ में डॉ. सियाराम शर्मा ने लिखा है कि -

 

ये शर्मिले स्वभाव के कवि हैं लेकिन वे गंभीर चिंतन एवं दार्शनिकता के साथ ही साथ मानवीय मूल्यों के प्रति सचेष्ट रहने वाले जागरूक एवं सचेत कवि हैं। उन्होंनेअरूणाचलनामक कविता में लिखा है कि -

माटी के पहाड़ों से गुजरते हुए

मैंने पहली बार जाना कि

जमीन ही जड़ों को नहीं बॉंधती

जड़ें भी जमीन को बांधती है।

बांधना, बंधने के बगैर भला कहॉं होती है।7

 

विनोद शर्मा की कविताएॅं प्रकृति और स्त्री को समर्पित है। इनकी कविताओं में गॉंव की गरीब लड़कियों का जीवन वैशिष्टय झलकता है। अपनी कविता में वे लिखते हैं कि -

धीरे-धीरे आती हैं लड़कियॉं

और सामने से गुजर जाती हैं

रोज घड़ी की माफिक

घूरती है उनको कई जोड़ी ऑखें

और धीरे-धीरे ऑंखें बुढ़ा जाती हैं

इसी बीच जाने कब लड़कियॉं

अचानक जवान हो जाती हें

और भादों की एक रात में गॉंव का पोखर।8

 

छत्तीसगढ़ के समकालीन हिंदी कवियों की पंक्ति में डॉ. शिव शैलेन्द्र की जो कविताए हैं वह भारतीय संस्कृति की लोकगाथाओं को तो गाती ही है वह कहंी-कहीं राष्ट्रीय जनजागरण का संदेश भी देती है। इसके साथ ही भारतेंदु हरिश्चंद की तरह देश दुनिया को सचेत करने के लिए व्यंग्यात्मक रचनाओं के द्वारा आम आदमी को जगाने का काम करती है। वास्तव में कवि ने समय के सताए हुए लोगों की दैनीय दशा उनकी आंतरिक पीड़ा, संत्र्रास और भ्रष्टाचारी नेताओं के साथ ही अफसरों के खिलाफ एक तरह से जंग की घोषणा करती है। उन्होंने अपनी कविता में लिखा है कि -

बेईमान के हाथों में जब शासन तंत्र हो जाता है

दुखित तृषित जनता कराहती वह ऑंखों में चढ़ जाता हे

धृतराष्ट्र की ऑंखों पर स्वार्थ की पट्टी देखा

दुर्बुद्धि के कारण मानव दुर्याधन बन जाता है

राजनीति के चौराहे पर क्यों नीति निर्वस्त्र खड़ी है।

हर गली मुहल्ले में अब तो

दुःशासन दिख जाता है।9

 

कवि शिव शैलेन्द्र की कविताएॅं हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है जो आम आदमी को आईना दिखाती है। वे लिखते हैं कि -

‘‘मेरा जी चाहता है कि

मैं तुमसे हर पल प्यार करूॅं

लेकिन समय के सताए हुए लोंगों की

कराह जब सुनता हूॅं

मैं अपने आप को रोक नहीं पाता

मैं खेत खलिहानों में

किसानों को पानी पिलाना

ज्यादा बेहतर समझता हूॅं

जिससे वे अपने देश के लिए

भरपूर अन्न उपजा सकेें।

लेकिन मैं करूॅ

सरकार की ऑंखों में धूल झोंककर

नेता-अफसर और बिचौलिए

बीच में ही अधिकाधिक

माल गटक जाते है

मेरे देश की अनपढ़ और गंवार जनता

इस गणित को समझ नही पाती ’’10

छत्तीसगढ़ के युवा कवयित्रियों में वंदना कंेगरानी अपने काव्य शब्दों के द्वारा अपनी एक अलग पहचान बनाती हुई दिखती है। इनकी कविताओं में भारतीय समाज की सबसे बड़ी कमजोरी दुरूहता एवं समाज के बीच नित प्रतिदिन भोगी हुई निजी जिंदगी को समाजीकरण करके इन्होंने अपनी रचनाओं को अपने निजी अनुभवों के द्वारा अभिव्यक्त करने का काम किया है। वे लिखती हैं कि -

एक दिन जब

मैंने पार करनी चाही थी दहलीज

अचानक खड़ी हो गई सामने

मॉं की पोटली भर सीख

और कदम

रूक गए अपने आप

तब से ही मैं खड़ी हूॅं

दहलीज के इस पार

और

वो उस पार।11

 

बसंत त्रिपाठी समकालीन हिंदी कविता के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। सहसा कुछ नहीं होताऔर मौजूदा हालात को देखते हुए तथा उत्सव की देखा जाए तो इनकी कविता एक विशिष्ट स्थान रखते हुए छत्तीसगढ़ के समकालीन कवियों में इन्हें एक सम्मानजनक स्थान दिलाती है। इनकी रचनाओं में सहजता, सरलता एवं शालीनता के भाव दिखाई देते हैं। यही कारण है कि इनकी रचना आम आदमी के बीच एंक पैठ बना लेती है। वे लिखते हैं कि

मनुष्य होना

पृथ्वी पर होने की सजा नहीं है

यह बात मैंने

किसी और से नहीं अपने आप से ही कही

कई-कई बार कही

और मनुष्य होने की सजा सही

कई-कई बार सही।12

 

छत्तीसगढ़ की युवा कवयित्रियों में अल्पना त्रिपाठी एक ऐसे कवयित्री के रूप में उभरकार आयी हैं जो अपने शब्द चित्रों के माध्यम से एक नये बिम्ब एंव प्रतीकों को गढ़ती हैं जिसमें एक स्त्री की सोच उसकी मार्यादा, उसके प्रेम की भाषा एवं जिवंतता दिखाई देती है वे लिखती हैं कि -

राधा के बाल मन में उठा एक भाव प्रेम का

ना स्पर्श की चाह थी, थी वस्ल की अधीरता

बढ़ जाता धड़कनों का धड़कना

उसे देखने, देख लेने मात्र से

एक टक आकाश में देखता मन,

उसका एक चित्र सा बनता

वही चित्र बैठ जाता मन में

बातें करती रहती मन ही मन उससे

देखना तो तीस दिनों में एक आध ही बार होता

बसा था ऑंखों मे वह तीसों दिन।13

 

आगे वह मिट्टी के माध्यम से स्त्री की महिमा का यशगान करते हुए लिखती हैं -

जिस मिट्टी में जन्म लेती

पलती बढ़ती सनती गढ़ती

उसी से विदा हो जाती

जिस मिट्टी को पहचानती नहीं

उसी में खाक होने की दुआ ले।14

 

छत्तीसगढ़ के भ्ूार्धन्य कवियों में विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएॅं एक तरह से मुक्तिबोध के बाद एक ऐसे मील की संरचना करती है जिस पर पूरे छत्तीगढ़ के युवा कवि एवं कवयित्री उसको आधार बनाकर काव्य सृजन करते हैं छत्तीसगढ़ के तमाम युवा कवि एवं कवयित्रियों की कविताओं का अवलोक किया जाए तो उन्होंने जैसा देखा, महसूस किया उसे अपना रचनाओं में वैसा ही मानवीय भाववृतियों के साथ लिखा जिससे लगता है कि ये कविताएॅ कुछ संदेश दे रही है कुछ कह रही हैं विनाद कुमार शुक्ल की एक रचना देखें जिसका शीर्षक हैवे मेेरे घर कभी नहीं आयेंगे’’में वे लिखते हैं कि -

जो मेरे घर कभी नहीे आयेंगे

मैं उनसे मिलने

उनके पास चला जाउॅंगा

एक उफनती नदी कभी नही आयेगी मेरे घर

नदी जैसे लोगों से मिलने

नदी किनारे जाउॅंगा

कुछ तैरूंगा और डूब जाउंगा।15

 

निष्कर्ष:-

छत्तीसगढ़ के समकालीन कवियों में युवा कवियों का काव्य जनमानस को चेताने वाला ,जगाने वाला, समझाने वाला काव्य है। देखा जाए तो वाल्मिीकी से लेकर कबीर, निराला, धूमिल, केदारनाथ सिंह, विनोद कुमार शुक्त, एकान्त श्रीवास्तव, विनोद शर्मा, शिव शैलेन्द्र, वंदना कंेगरानी, अल्पना त्रिपाठी, बसंत त्रिपाठी जैसे युवा कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से आम आदमी के मानसिक पीड़ा, संत्रास, बेचैनी, प्रेम की चाहत, जैसी उन तमाम भाव वृत्तियो को शब्द चित्रों, प्रतीकों एवं बिम्बों के माध्यम से काव्य का सृजन किया है। इन युवा कवियों की कविताओं में हिंदी साहित्य के उन तमाम उत्कृष्ट साहित्यकारों की प्रतिच्छाया भी नजर आती है। जैसे कि शिव शैलेन्द्र की कविता में भारतीय उपमहाद्वीप के उन तमाम सनातनियों को जगाने की बात की जाती है, जैसे -

जागो जागो भारतवासी

शैलराज हुंकार रहा है।

सप्त सिंधु की ज्वालाओं से

दग्ध खण्ड चितकार रहा है16

 

कठोपनिषद में नचिकेता को यम के आत्म जागरण का उपदेश दिया था। ठीक उसी तरह छत्तीसगढ़ के युवा कवियों ने भारतीय समाज की सुसुप्ती को तोड़ने के लिए जनजागरण का संदेश दिया है। जो हिंदी साहित्य के विकास में इन कवियों की रचनाएॅं अपना महत्वपूर्ण योगदान देगी।

 

संदर्भ ग्रंथ सूची:-

1-   मुक्तिबोध गजानन माधव, चॉंद का मुॅंह टैढ़ा है, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन नयी दिल्ली, चौबीसवॉं संस्करण 2018 पृ. क्र. 254

2-   &

3-   श्री रंग, छत्तीसगढ़ के कवि, विभा प्रकाशन इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण 2016 पृ. क्र. 75

4-   वही, पृ. क्र. 76

5-   वही, पृ. क्र. 70

6-   वही, पृ. क्र. 72

7-   शर्मा विनोद, धरती कभी बॉझ नहीं होती अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद, प्रथम संस्करण 2019 पृ. क्र. 44

8-   वही, पृ. क्र. 17

9-   डॉ. शिव शैलेन्द्र, समर शेष है साथी, वैभव प्रकाशन, रायपुर (..) प्रथम संस्करण 2022 पृ. क्र. 32

10-  वही, पृ. क्र. 103

11-  श्री रंग, छत्तीसगढ़ के कवि, विभा प्रकाशन इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण 2016 पृ. क्र. 97

12-  वही, पृ. क्र. 118

13-  &

14-  &

15-  सिंघई अशोक, कविता छत्तीसगढ़, प्रमोद वर्मा, स्मृति संस्थान रायपुर (..) पृ. क्र. 4

16-  शिव शैलेन्द्र समर शेष है साथी, पृ. क्र. 03

 

 

 

Received on 08.03.2024         Modified on 19.03.2024

Accepted on 11.04.2024         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2024; 12(1):50-56.

DOI: 10.52711/2454-2687.2024.00010